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आम जनता के लिए अव्यवस्थाओं का केंद्र बना सीएचसी

बिलग्राम/हरदोई। रिजवान अहमद। नगर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की चर्चा मरीजों की जान से खिलवाड़ करने में ज्यादा जानी जाती है।जहां पर गिनती के कुछ एक डॉक्टरों को यदि छोड़ दें तो शेष अपनी जेभें भरने में ज्यादा व्यस्त रहने के दिन रात कोशिश करते हैं।यही हाल अधीक्षक की कुर्सी का है, जिसे हथियार के रूप में हमेशा प्रयोग करने का उपयोग किया गया।शायद यही कारण है कि लाखों रुपए का मासिक बजट आवंटन होने के बावजूद सफाई, पेयजल व शौचालय आजतक कोसों दूर नजर आता है।सफाई व्यवस्था के लिए नगर पालिका को जिम्मेदारी सौंपी गयी पर परिसर के अंदर की गंदगी अस्पताल प्रशासन द्वारा दूर उस समय की जाती है जब सरकार द्वारा सफाई अभियान चलाया जाता है।कुछ यही हाल पेयजल का है जहां पर केवल दो इंडिया मार्का हैंडपंपों से हजारों लोगों की प्यास बुझाने की अपनी मजबूरी है।शौचालय व्यवस्था में भारत सरकार ने भले ही दूर दराज के सुदूरवर्ती इलाकों में भी खुले में शौच मुक्त बन्द करने में सफलता प्राप्त की हो। लेकिन कई अस्पतालों को मिलाकर बनाए गए इस सेंटर सीएचसी पर शौचालय सार्वजनिक क्षेत्र में न बने होने की वजह से नजर नहीं आता।इतने बड़े परिसर में भी संचालित हो रहे इस अस्पताल में सार्वजनिक शौचालय निर्माण न होने के कारण मरीजों के परिजनों महिलाओं-पुरुषों को शर्म संकोच को छोड़कर दीवालों के कोनों को चुनाव करना मजबूरी बन चुकी है।अगर परिजनों के विश्राम करने की स्थिति बयां करने की बात करें तो परिसर के बाहर खुले आसमान में महज तीन सीमेंटेड बेंच के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलता।यदि वर्षा होने लगे तो अस्पताल परिसर में डॉक्टरों के आवास के नीचे कुछ जगह या फिर खिड़कियों के लेंटरो के नीचे ही खड़े होकर वक्त गुजारना हर व्यक्ति की मजबूरी है। कुछ यही स्थिति देर शाम बिजली चले जाने के बाद मरीजों द्वारा मरहम पट्टी कराने के समय जनरेटर के लिए हजारों रुपये महीने का बजट डकारने के बाद भी अंधेरे में मरीजों का इलाज किया जाता है।
यह तो रही नगर स्थित सीएचसी अस्पताल में जिंदा प्राणियों के सेवाकार्य की अव्यवस्था।इससे कई कदम आगे दिवंगत आत्मा व उनके परिजनों को इस अस्पताल में कष्ट भोगना पड़ता है।जहां पर पहले एक मोर्चरी टीन शेड डालकर बनी थी।लेकिन अस्पताल परिसर में एक अन्य भवन निर्माण कार्य किया गया तो उस मोर्चरी को भी हटा दिया।तब से लेकर आज तक सर्दी गर्मी व बरसात में शव को परिसर के पोर्टको या फिर खुले आसमान के नीचे परिजनों को रखना मजबूरी बन गई है।लेकिन इतने वर्षों तक अस्पताल में अधीक्षक कार्यालय को संचालित करने वाले हुक्मरानों को दिवंगत प्राणियों पर भी रहम नहीं आया।विशिष्ट सूत्रों द्वारा जानकारी प्राप्त हुई कि अब मोर्चरी के नाम पर एक व्यवसायी द्वारा पांच हजार रुपए का चन्दा हासिल कर महज दो खम्भे ईंटो से निर्माण कार्य करवाने के साथ मजाक उड़ाते हुए तनिक भी शर्म महसूस नहीं की गई कि जिस स्थान पर यह निर्माण कार्य करवाया जा रहा है उसकी क्षमता बढ़ा कर कम से कम 15×30 तो होती।जिससे आपात स्थिति में कम से कम बीस व्यक्ति छाँव में बैठ कर सकें।

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