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बिन सत्संग विवेक न होई:शंकराचार्य

मल्लावां/हरदोई 22 अक्टूबर।अभिनवमिश्रा। शान्ती सत्संग मंच के 45 वे वर्ष के आध्यात्मिक प्रवचन एवं संत सम्मेलन का दूसरे दिन पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी आत्मानंद जी ने सत्संग की महन्ता पर जोर दिया । सत्संग व्यक्ति को सद्विचारों की ओर ले जाता है। और उसके व्यक्तित्व को भी बदल देता है। जैसे चुम्बक के बार-बार घर्षण से लौहखण्ड भी चुम्बक बन जाता है। उसी तरह से सत्संग के प्रभाव से साधारण जीव भक्त बन जाता है। क्योकि उसके भीतर भी अव्यवस्था और अशन्ती स्वतः दूर हो जाती है। सत्संग एक दर्पण है। इसमे अपने आपको देखने के और सुधारने का मौका है। क्योंकी हमारे वश में जीवन और मृत्यु हमारे हाथ में नहीं है। हमारे वश में ही। धर्म के समझना और अनुभव करना है और उसको जीवन में अनुसरण करना चाहिए।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी रामस्वारुपाचार्य ने गोस्वामी तुलसीदास के व्यक्तित्व की विशेषताओं का विवेचन करते हुए उनके द्वारा रचित श्री रामचरित मानस के संदर्भो को रेखांकित किया । उन्होंने कहा कि आतंकवाद आज राष्ट्र और सम्पूर्ण विश्व की सबसे प्रमुख समस्या है। इस छड़ भुंगर जीवन में भगवान का स्मरण बहुत जरुरी है। इसलिए अपने कल्याण के लिए ईश्वर का सदैव ध्यान करना चाहिए किसी भी विधि से भगवान के स्मरण किया जाए तो पाप नष्ट हो जाते है। भगवान के नाम का यह स्वाभाविक गुण है ऐसी राम के नाम में शक्ति है।
जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी धीरेन्द्राचार्य जी महाराज ने सत्संग में कहा कि विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जिसकी परम पावन भूमि पर सौदर्य और माधुर्य के निदान अखिल ब्रह्माण्ड नायक सर्वशक्तिमान अपनी योगमाया के द्वारा अपने प्रेमी भक्तो के आनन्दित करते हुए स्वयं आनन्द का अनुभव करते है साथ ही विश्वास व कल्याण एंव परम मंगल करते है। भगवान भारत देश में ही जन्म क्यों लेते है क्यों की भारत तीन शब्दो से मिलकर बना है भा,र,और त। भा से भक्ति, र से राम के चरणों की रति, ओर त से त्याग। इन्ही तीन विशेषताओं के कारण भगवान को मजबूर होकर जन्म लेना पड रहा है। आज के सत्य क्या है यही तुम कथा सुन रहे हो ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या जहाँ स्वार्थ आ जाता है वही मिथ्या का आभास हो जाता है। ईश्वर ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही ईश्वर है। ब्रह्म है केवल पूर्ण है संसार में कोई भी चीज परिपूर्ण नहीं है। अगर आपको ब्रह्म का साक्षात्कार करना हो तो ब्रह्म महूर्त में ही उठना सीखो अन्यथा कभी भी ब्रह्म का एहसास नहीं होगा।
अयोध्या धाम से पधारे पं0 मधुसूदन दास जी ने धर्म के वास्तविक स्वरुप को पहचान कर उस पर चलने वाला मनुष्य ही भवसागर से पार हो सकता है। धर्म को धारण करने के लिए साथ-साथ चारित्रवान होना परम आवश्यक है। चरित्र की महन्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तुलसीदासजी रामायण के नाम रामचरित मानस रखा क्यों कि मानस अर्थात मनुष्य और राम अर्थात परब्रह्म। इसका तात्पर्य यह है कि परब्रह्म तक पहुँचने के लिए मनुष्य को चरित्ररुपी सीढ़ी की आवश्यकता होती है। चारित्र ठीक होने पर हम भवसागर को पार कर सकते है। हम सब भवसागर के तट् पर खडे है एक तट तो दिखाई पड़ रहा है पंरतु सागर का दूसरा तट दिखाई नहीं देता।
अशोक शास्त्री ने बताया कि हु। सन्तो को इसलिए प्रणाम करते है क्यों कि उनमे आचरण है जैसे फूल में सुगन्ध है, बर्फ में ठण्डक है, लकड़ी में आग है सुर्य में प्रकाश है वह उनसे अलग नहीं है। इस प्रकार आत्मा परमात्मा से अलग नहीं है।

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